Stanzas on the Divine Pulsation · 2.3

Stanzas on the Divine Pulsation 2.3

2.3
यस्मात्सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥३॥
yasmāt sarva-mayo jīvaḥ sarva-bhāva-samudbhavāt | tat-saṃvedana-rūpeṇa tādātmya-pratipattitaḥ ||
anuṣṭubh
— जिससे, क्योंकि (अपादान-सूचक सम्बन्धवाचक) ; — सर्वमय — सब कुछ जिसमें समाहित है (कर्ता कारक — समासगत) ; — जीव — व्यक्तिगत आत्मा (कर्ता कारक) ; — सब भावों के उद्भव से (अपादान कारक — समासगत) ; — उसके संवेदन (बोध) के रूप से (करण कारक — समासगत) ; — तादात्म्य की प्रतिपत्ति (एकत्व-अनुभूति) से (अव्यय)

क्योंकि जीव सर्वमय (सबका सार-रूप) है — सब भाव उसी से उत्पन्न होते हैं — उसके संवेदन-रूप (बोध-स्वरूप) के द्वारा तथा तादात्म्य (एकात्मता) की प्रतिपत्ति (पहचान) से...