Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.2 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.2

9.2
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ ९-२ ॥
rājavidyā rājaguhyaṃ pavitramidamuttamam | pratyakṣāvagamaṃ dharmyaṃ susukhaṃ kartumavyayam || 9-2 ||
— राजविद्या, राजगुह्य ; — यह परम पवित्र ; — प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला, धर्म के अनुकूल ; — करने में सुगम, अव्यय

यह राजविद्या, राजगुह्य, परम पवित्र, श्रेष्ठ, प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला, धर्म के अनुकूल, करने में अत्यन्त सुगम और अव्यय है।