Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.12 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.12

7.12
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान् विद्धि नत्वहं तेषु ते मयि ॥ ७-१२ ॥
ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye | matta eveti tān viddhi natvahaṃ teṣu te mayi || 7-12 ||
— जो भी सात्त्विक भाव हैं ; — और जो राजसिक, तामसिक ; — उन्हें मुझसे ही (उत्पन्न) जान ; — किन्तु मैं उनमें नहीं, वे मुझमें

जो भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भाव हैं, उन्हें मुझसे ही (उत्पन्न) जान; किन्तु मैं उनमें नहीं, वे मुझमें हैं।