Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.48 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.48

6.48
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन ! ॥ ६-४८ ॥
tapasvibhyo'dhiko yogī jñānibhyo'pi mato'dhikaḥ | karmibhyaścādhiko yogī tasmād yogī bhavārjuna ! || 6-48 ||
— योगी तपस्वियों से अधिक ; — ज्ञानियों से भी अधिक माना गया ; — और कर्मियों से भी अधिक योगी ; — अतः योगी बन, हे अर्जुन

योगी तपस्वियों से अधिक है, ज्ञानियों से भी अधिक माना गया है, और कर्मियों से भी अधिक है; अतः हे अर्जुन, तू योगी बन।