Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.1 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.1

4.1
एवं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ ४-१ ॥
evaṃ vivasvate yogaṃ proktavānahamavyayam | vivasvānmanave prāha manurikṣvākave'bravīt || 4-1 ||
— इस योग को विवस्वान् (सूर्य) से ; — मैंने कहा, अव्यय को ; — विवस्वान् ने मनु से कहा ; — मनु ने इक्ष्वाकु से कहा

इस अव्यय योग को मैंने विवस्वान् (सूर्य) से कहा था; विवस्वान् ने मनु से कहा, और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।