Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.25 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.25

2.25
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २-२५ ॥
acchedyo'yamadāhyo'yamakledyo'śoṣya eva ca | nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo'yaṃ sanātanaḥ || 2-25 ||
— यह अच्छेद्य, यह अदाह्य ; — अक्लेद्य और अशोष्य भी ; — नित्य, सर्वगत, स्थाणु ; — अचल, यह सनातन

यह आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य है; यह नित्य, सर्वगत, स्थाणु, अचल और सनातन है।