Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.12 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.12

18.12
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १८-१२ ॥
aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam | bhavatyatyāgināṃ pretya na tu saṃnyāsināṃ kvacit || 18-12 ||
— अनिष्ट, इष्ट और मिश्र ; — त्रिविध कर्म का फल ; — अत्यागियों को मरणोपरान्त मिलता है ; — किन्तु संन्यासियों को कभी नहीं

अनिष्ट, इष्ट और मिश्र — कर्म का यह त्रिविध फल अत्यागियों को मरणोपरान्त मिलता है, किन्तु संन्यासियों को कभी नहीं।