Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.14 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.14

15.14
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमास्थितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १५-१४ ॥
ahaṃ vaiśvānaro bhūtvā prāṇināṃ dehamāsthitaḥ | prāṇāpānasamāyuktaḥ pacāmyannaṃ caturvidham || 15-14 ||
— मैं वैश्वानर (जठराग्नि) होकर ; — प्राणियों के शरीर में स्थित ; — प्राण-अपान से युक्त होकर ; — चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ

मैं वैश्वानर (जठराग्नि) होकर प्राणियों के शरीर में स्थित हूँ, और प्राण तथा अपान से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।