गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
१५-१३ ॥
gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā |
puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ ||
15-13 ||
और पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपने ओज से भूतों को धारण करता हूँ; और रस-स्वरूप सोम (चन्द्र) होकर मैं समस्त औषधियों को पुष्ट करता हूँ।