Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.27 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.27

11.27
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ ११-२७ ॥
vaktrāṇi te tvaramāṇā viśanti daṃṣṭrākarālāni bhayānakāni | kecidvilagnā daśanāntareṣu sandṛśyante cūrṇitairuttamāṅgaiḥ || 11-27 ||
— शीघ्रता से आपके मुखों में प्रवेश करते हैं ; — दाढ़ों से विकराल, भयानक ; — कुछ दाँतों के बीच फँसे हुए ; — चूर्ण किए सिरों के साथ दिखाई देते हैं

वे शीघ्रता से दाढ़ों से विकराल और भयानक आपके मुखों में प्रवेश करते हैं; कुछ दाँतों के बीच फँसे हुए, चूर्ण किए हुए सिरों के साथ दिखाई देते हैं।