The Great Liberation Tantra3.88
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैरिष्ट्वा यत् फलमश्नुते ।
भक्षिते ब्रह्म नैवेद्ये तस्मात् कोटिगुणं लभेत् ॥८८॥
aśvamedhādibhiryajñairiṣṭvā yat phalamaśnute |
bhakṣite brahma naivedye tasmāt koṭiguṇaṃ labhet ||88||
— अश्वमेध आदि यज्ञों से ; — यजन करके ; — जो ; — फल ; — प्राप्त करता है ; — भक्षण किए जाने पर ; — ब्रह्म-नैवेद्य के ; — उससे ; — करोड़-गुना ; — प्राप्त करे अश्वमेध आदि यज्ञों से यजन करके जो फल प्राप्त होता है, ब्रह्म-नैवेद्य के भक्षण से उससे करोड़-गुना (फल) प्राप्त होता है।