The Great Liberation Tantra· 3.87 / 153

The Great Liberation Tantra3.87

3.87
सार्द्धत्रिकोटितीर्थेषु स्नानदानेन यत्फलम् । तत् फलं लभते मर्त्यो ब्रह्मार्पितनिषेवणात् ॥८७॥
sārddhatrikoṭitīrtheṣu snānadānena yatphalam | tat phalaṃ labhate martyo brahmārpitaniṣevaṇāt ||87||
— साढ़े तीन करोड़ तीर्थों में ; — स्नान और दान से ; — जो फल ; — वह ; — फल ; — प्राप्त करता है ; — मर्त्य ; — ब्रह्म-अर्पित (प्रसाद) के सेवन से

साढ़े तीन करोड़ तीर्थों में स्नान और दान से जो फल होता है, वह फल मर्त्य ब्रह्म-अर्पित (प्रसाद) के सेवन से प्राप्त कर लेता है।