सार्द्धत्रिकोटितीर्थेषु स्नानदानेन यत्फलम् ।
तत् फलं लभते मर्त्यो ब्रह्मार्पितनिषेवणात् ॥८७॥
sārddhatrikoṭitīrtheṣu snānadānena yatphalam |
tat phalaṃ labhate martyo brahmārpitaniṣevaṇāt ||87||
साढ़े तीन करोड़ तीर्थों में स्नान और दान से जो फल होता है, वह फल मर्त्य ब्रह्म-अर्पित (प्रसाद) के सेवन से प्राप्त कर लेता है।