सत्तामात्रं निर्विशेषमवाङ्मनसगोचरम् ।
असत्त्रिलोकीसद्भानं स्वरूपं ब्रह्मणः स्मृतम् ॥७॥
sattāmātraṃ nirviśeṣamavāṅmanasagocaram |
asattrilokīsadbhānaṃ svarūpaṃ brahmaṇaḥ smṛtam ||7||
मात्र सत्ता, निर्विशेष, वाणी और मन की पहुँच से परे, (वस्तुतः) असत् त्रिलोकी की सत्-रूप प्रतीति — यही ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है।