विना चौरगणेशादिजपञ्च कुल्लुकां विना ।
अकस्मात् परमब्रह्मसाक्षात्कारो भवेद् ध्रुवम् ॥११८॥
vinā cauragaṇeśādijapañca kullukāṃ vinā |
akasmāt paramabrahmasākṣātkāro bhaved dhruvam ||118||
और चौर, गणेश आदि के (प्रारम्भिक) जप के बिना, तथा कुल्लुका के बिना — सहसा ही परम ब्रह्म का साक्षात्कार निश्चय ही हो जाता है।