The Great Liberation Tantra· 3.118 / 153

The Great Liberation Tantra3.118

3.118
विना चौरगणेशादिजपञ्च कुल्लुकां विना । अकस्मात् परमब्रह्मसाक्षात्कारो भवेद् ध्रुवम् ॥११८॥
vinā cauragaṇeśādijapañca kullukāṃ vinā | akasmāt paramabrahmasākṣātkāro bhaved dhruvam ||118||
— बिना ; — चौर, गणेश आदि के (प्रारम्भिक) जप ; — कुल्लुका ; — बिना ; — सहसा ; — परम ब्रह्म का साक्षात्कार ; — हो ; — निश्चय ही

और चौर, गणेश आदि के (प्रारम्भिक) जप के बिना, तथा कुल्लुका के बिना — सहसा ही परम ब्रह्म का साक्षात्कार निश्चय ही हो जाता है।