The Great Liberation Tantra· 3.109 / 153

The Great Liberation Tantra3.109

3.109
गायत्रीं शृणु चार्वङ्गि सर्वपापप्रणाशिनीम् । परमेश्वरं ङेऽन्तमुक्त्वा विद्महे तदनन्तरम् ॥१०९॥
gāyatrīṃ śṛṇu cārvaṅgi sarvapāpapraṇāśinīm | parameśvaraṃ ṅe'ntamuktvā vidmahe tadanantaram ||109||
— गायत्री को ; — सुनो ; — हे चारु-अंगि ; — समस्त पापों को नष्ट करने वाली ; — 'परमेश्वर' (को कर्म रूप में) ; — '-णे' अन्त वाले (चतुर्थी) को ; — कहकर ; — 'विद्महे' ; — तदनन्तर

हे चारु-अंगि, समस्त पापों को नष्ट करने वाली गायत्री सुनो: '-णे' अन्त वाले (चतुर्थी विभक्तियुक्त) 'परमेश्वराय' को कहकर, तदनन्तर 'विद्महे',