The Great Liberation Tantra· 3.100 / 153

The Great Liberation Tantra3.100

3.100
मात्सर्यहीनोऽदम्भी च दयावान् शुद्धमानसः । मातापित्रोः प्रीतिकारी तयोः सेवनतत्परः ॥१००॥
mātsaryahīno'dambhī ca dayāvān śuddhamānasaḥ | mātāpitroḥ prītikārī tayoḥ sevanatatparaḥ ||100||
— मात्सर्य से रहित ; — दम्भरहित ; — और ; — दयावान् ; — शुद्ध-मन ; — माता-पिता को ; — प्रसन्न करने वाला ; — उन दोनों की ; — सेवा में तत्पर

मात्सर्य से रहित, दम्भरहित, दयावान्, शुद्ध-मन, माता-पिता को प्रसन्न करने वाला, और उन दोनों की सेवा में तत्पर हो;