इन्द्रियाणां सुखार्थाय पीत्वा च बहुलं मधु ।
भविष्यन्ति मदोन्मत्ता हिताहितविवर्जिताः ॥५९॥
indriyāṇāṃ sukhārthāya pītvā ca bahulaṃ madhu |
bhaviṣyanti madonmattā hitāhitavivarjitāḥ ||59||
इन्द्रियों के सुख के लिए वे प्रचुर मद्य पीकर मद से उन्मत्त हो जाएँगे और हित-अहित के विवेक से रहित हो जाएँगे।