Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.17 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.17

12.17
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभफलत्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १२-१७ ॥
yo na hṛṣyati na dveṣṭi na śocati na kāṅkṣati | śubhāśubhaphalatyāgī bhaktimānyaḥ sa me priyaḥ || 12-17 ||
— जो हर्षित होत नाही, द्वेष करत नाही ; — शोक करत नाही, आकांक्षा करत नाही ; — शुभाशुभ फलांचा त्यागी ; — भक्तियुक्त जो, तो मला प्रिय

जो हर्षित होत नाही, द्वेष करत नाही, शोक करत नाही, आकांक्षा करत नाही, शुभाशुभ फलांचा त्याग करणारा, भक्तियुक्त असा जो, तो मला प्रिय आहे.