Vijñāna Bhairava Tantra · 1.95

Vijñāna Bhairava Tantra 1.95

1.95
आधारेष्वथवाशक्त्या ज्ञानाद्वा देशकल्पनात् । उज्जाते शक्तिसंशोभे शान्ते पश्चात्तदा भवेत् ॥९५॥
ādhāreṣv athavāśaktyā jñānād vā deśakalpanāt | ujjāte śaktisaṃśobhe śānte paścāt tadā bhavet
anuṣṭubh
— आधारों पर (अधिकरण बहुवचन) ; — अथवा अशक्ति (असमर्थता) से (अव्यय + करण कारक) ; — ज्ञान से (अपादान कारक) ; — अथवा (अव्यय) ; — देश-कल्पना से (अपादान — समासगत) ; — शक्ति-संशोभ (शक्ति का प्रकाश) के उत्पन्न होने पर (सति-सप्तमी — समासगत) ; — उसके बाद शान्त होने पर तब (परम अवस्था) हो जाती है — अव्यय + अधिकरण + विधि लिङ्

आधारों पर — अथवा अशक्ति से, अथवा ज्ञान से, अथवा देश-कल्पना से — जब शक्ति-संशोभ (शक्ति का प्रकाश/उद्गार) उत्पन्न हो और उसके शान्त होने पर — तब (परम अवस्था) हो जाती है। (धारणा ७७)