Vijñāna Bhairava Tantra · 1.45

Vijñāna Bhairava Tantra 1.45

1.45
सर्वतः स्वशरीरस्य द्वादशान्ते मनोलयात् । दृढबुद्धेर्दृढीभूतं तत्त्वलक्ष्यं प्रवर्तते ॥४५॥
sarvataḥ svaśarīrasya dvādaśānte manolayāt | dṛḍhabuddher dṛḍhībhūtaṃ tattvalakṣyaṃ pravartate
anuṣṭubh
— सर्वतः, सब ओर से (अव्यय) ; — अपने शरीर के (षष्ठी — समासगत) ; — द्वादशान्त में (अधिकरण — समासगत) ; — मन के लय से (अपादान — समासगत) ; — दृढ़-बुद्धि वाले के लिए (षष्ठी — समासगत) ; — दृढ़-भूत, स्थिर हुआ (विशेषण) ; — तत्त्व-लक्ष्य, परम लक्ष्य (कर्ता कारक — समासगत) ; — प्रवर्तित होता है (कर्मवाच्य वर्तमान)

अपने शरीर के सर्वतः (सब ओर) द्वादशान्त में मन का लय करने से दृढ़-बुद्धि (साधक) के लिए तत्त्व-लक्ष्य (परम लक्ष्य) दृढ़ रूप से प्रवर्तित होता है। (धारणा २७)