Vijñāna Bhairava Tantra · 1.44

Vijñāna Bhairava Tantra 1.44

1.44
हृद्याकाशे निलीनाक्षः पद्मसम्पुटमध्यगः । अनन्यचेताः सुभगे परं सौभाग्यमाप्नुयात् ॥४४॥
hṛdyākāśe nilīnākṣaḥ padmasampuṭamadhyagaḥ | ananyacetāḥ subhage paraṃ saubhāgyam āpnuyāt
anuṣṭubh
— हृदय-आकाश में (अधिकरण — समासगत) ; — लीन (निलीन) इन्द्रियों वाला (समासगत विशेषण) ; — पद्म-सम्पुट (कमल के दलों के बीच) के मध्य में स्थित (समासगत विशेषण) ; — अनन्य-चित्त, एकाग्र-चित्त (समासगत विशेषण) ; — हे सुभगे! (सम्बोधन) ; — परम सौभाग्य प्राप्त करे (कर्म कारक + विधि लिङ्)

हे सुभगे! हृदय-आकाश में नीचे-निलीन इन्द्रियों वाला, पद्म-सम्पुट (कमल के दोनों दलों के बीच) के मध्य में स्थित, अनन्य-चित्त (एकाग्र-चित्त) साधक परम सौभाग्य को प्राप्त करता है। (धारणा २६)