Vijñāna Bhairava Tantra · 1.15

Vijñāna Bhairava Tantra 1.15

1.15
शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्विभागेन भावना । तदासौ शिवरूपी स्यात्शैवी मुखमिहोच्यते ॥१५॥
śaktyavasthāpraviṣṭasya nirvibhāgena bhāvanā | tadāsau śivarūpī syāt śaivī mukham ihocyate
anuṣṭubh
— शक्ति की अवस्था में प्रविष्ट (साधक) का (षष्ठी एकवचन — समासगत) ; — निर्विभाग (अखण्ड) रूप से (करण कारक) ; — भावना, अनुभूति (कर्ता कारक) ; — तब (अव्यय) ; — वह, असौ (कर्ता कारक) ; — शिव-रूप हो जाता है (विधि लिङ्) ; — शाक्त — शक्ति-मार्ग (कर्ता कारक स्त्रीलिङ्ग) ; — मुख, द्वार (कर्ता कारक) ; — यहाँ, इस तन्त्र में (अव्यय) ; — कहा जाता है (कर्मवाच्य वर्तमान)

शक्ति की अवस्था में प्रविष्ट (साधक) की निर्विभाग (अखण्ड) भावना से उस समय वह शिव-स्वरूप हो जाता है; यहाँ इसी को शाक्त मुख (शिव में प्रवेश का द्वार) कहा गया है।