Vijñāna Bhairava Tantra · 1.14

Vijñāna Bhairava Tantra 1.14

1.14
न वह्नेर्दाहिका शक्तिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते । केवलं ज्ञानसत्तायां प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥१४॥
na vahner dāhikā śaktir vyatiriktā vibhāvyate | kevalaṃ jñānasattāyāṃ prārambho'yaṃ praveśane
anuṣṭubh
— नहीं (निषेधार्थ) ; — अग्नि की (अपादान/षष्ठी एकवचन) ; — दाहक शक्ति (कर्ता कारक) ; — पृथक्, अलग (विशेषण) ; — कल्पित होती है, मानी जाती है (कर्मवाच्य वर्तमान) ; — केवल, मात्र (अव्यय) ; — ज्ञान-सत्ता में (अधिकरण — समासगत) ; — यह प्रारम्भ है (कर्ता कारक) ; — प्रवेश के विषय में, प्रवेश-द्वार के रूप में (अधिकरण कारक)

अग्नि की दाहक शक्ति को अग्नि से पृथक् नहीं माना जाता; (इसी प्रकार शक्ति शिव से अभिन्न है)। केवल ज्ञान-सत्ता में प्रवेश के लिए यह (शक्ति-शिव का भेद-कथन) एक प्रारम्भिक उपाय है।