Vijñāna Bhairava Tantra · 1.133

Vijñāna Bhairava Tantra 1.133

1.133
इच्छायामथवा ज्ञाने जाते चित्तं निवेशयेत् । आत्मबुद्ध्यानन्यचेतास्ततस्तत्त्वार्थदर्शनम् ॥१३३॥
icchāyām athavā jñāne jāte cittaṃ niveśayet | ātmabuddhyānanyacetās tatas tattvārthadarśanam
anuṣṭubh
— इच्छा में / ज्ञान में (अधिकरण कारक) ; — आत्म-बुद्धि से, 'यह आत्मा है' इस बोध से (करण — समासगत) ; — तत्त्वार्थ का दर्शन (कर्ता — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ८१] इच्छा या ज्ञान के उत्पन्न होने पर चित्त को (उसी पर) निवेशित करे; आत्म-बुद्धि से अनन्य-चित्त होकर तब तत्त्वार्थ का दर्शन होता है।