इच्छायामथवा ज्ञाने जाते चित्तं निवेशयेत् ।
आत्मबुद्ध्यानन्यचेतास्ततस्तत्त्वार्थदर्शनम् ॥१३३॥
icchāyām athavā jñāne jāte cittaṃ niveśayet |
ātmabuddhyānanyacetās tatas tattvārthadarśanam
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ८१] इच्छा या ज्ञान के उत्पन्न होने पर चित्त को (उसी पर) निवेशित करे; आत्म-बुद्धि से अनन्य-चित्त होकर तब तत्त्वार्थ का दर्शन होता है।