Vijñāna Bhairava Tantra · 1.132

Vijñāna Bhairava Tantra 1.132

1.132
यदा ममेच्छा नोत्पन्ना ज्ञानं वा कस्तदास्म्यहम् । तत्त्वतोऽहं तथाभूतस्तल्लीनस्तन्मना भवेत् ॥१३२॥
yadā mamecchā notpannā jñānaṃ vā kas tadāsmy aham | tattvato'haṃ tathābhūtas tallīnas tanmanā bhavet
anuṣṭubh
— इच्छा / ज्ञान (कर्ता कारक) ; — मैं कौन हूँ? (प्रश्न + वर्तमान उत्तम पुरुष) ; — तन्मन, उसी पर लगे हुए मन वाला (कर्ता — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ८०] जब न इच्छा उत्पन्न हो, न ज्ञान — तब 'मैं कौन हूँ?' — तत्त्वतः मैं वही हूँ, ऐसा होकर तल्लीन-तन्मन हो जाए।