Vijñāna Bhairava Tantra · 1.131

Vijñāna Bhairava Tantra 1.131

1.131
झगितीच्छां समुत्पन्नामवलोक्य शमं नयेत् । यत एव समुद्भूता ततस्तत्रैव लीयते ॥१३१॥
jhagitīcchāṃ samutpannām avalokya śamaṃ nayet | yata eva samudbhūtā tatas tatraiva līyate
anuṣṭubh
— सहसा, अचानक (अव्यय) ; — शम को पहुँचाये (कर्म + विधि लिङ्) ; — जिससे, जहाँ से (अपादान)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७९] सहसा उत्पन्न इच्छा को देखकर शान्त करे; जहाँ से उत्पन्न हुई थी, वहीं वह लीन हो जाती है।