The Essence of the Tantra· 8.16 / 93

The Essence of the Tantra8.16

8.16

चित्प्राधान्ये शिवतत्त्वम् आनन्दप्राधान्ये शक्तितत्त्वम् इच्छाप्राधान्ये सदाशिवतत्त्वम् इच्छाया हि ज्ञानक्रिययोः साम्यरूपाभ्युपगमात्मकत्वात् ज्ञानशक्तिप्राधान्ये ईश्वरतत्त्वम् क्रियाशक्तिप्राधान्ये विद्यातत्त्वम् इति

Transliteration (IAST)

citprādhānye śivatattvam ānandaprādhānye śaktitattvam icchāprādhānye sadāśivatattvam icchāyā hi jñānakriyayoḥ sāmyarūpābhyupagamātmakatvāt jñānaśaktiprādhānye īśvaratattvam kriyāśaktiprādhānye vidyātattvam iti

— चित् की प्रधानता में ; — आनन्द की प्रधानता में ; — इच्छा की प्रधानता में ; — (ज्ञान-क्रिया के) साम्य-रूप के अभ्युपगम (स्वीकार) रूप होने के कारण ; — ज्ञान-शक्ति की प्रधानता में ; — क्रिया-शक्ति की प्रधानता में ; — विद्या-तत्त्व (= शुद्धविद्या)

चित् की प्रधानता में शिव-तत्त्व; आनन्द की प्रधानता में शक्ति-तत्त्व; इच्छा की प्रधानता में सदाशिव-तत्त्व — क्योंकि इच्छा ज्ञान और क्रिया के साम्य-रूप के अभ्युपगम (स्वीकार) रूप है; ज्ञान-शक्ति की प्रधानता में ईश्वर-तत्त्व; क्रिया-शक्ति की प्रधानता में विद्या-तत्त्व।