The Essence of the Tantra· 6.22 / 82

The Essence of the Tantra6.22

6.22

तत्र प्रत्यङ्गुलं पञ्च तिथयः तत्रापि दिनरात्रिविभागः एवं प्रवेशे दक्षिणायनं गर्भत्वम् उद्भवेच्छा उद्बुभूषुता उद्भविष्यत्वम् उद्भवारम्भः उद्भवत्ता जन्मादिविकारषट्कं च इति क्रमात् मकरादिषु इति

Transliteration (IAST)

tatra pratyaṅgulaṃ pañca tithayaḥ tatrāpi dinarātrivibhāgaḥ evaṃ praveśe dakṣiṇāyanaṃ garbhatvam udbhavecchā udbubhūṣutā udbhaviṣyatvam udbhavārambhaḥ udbhavattā janmādivikāraṣaṭkaṃ ca iti kramāt makarādiṣu iti

— प्रत्येक अँगुल में ; — पाँच तिथियाँ ; — दिन-रात का विभाग ; — प्रवेश में (अन्तःश्वास में) ; — दक्षिणायन — सूर्य का दक्षिण-गमन ; — गर्भत्व — गर्भ में रहना ; — उद्भव-इच्छा — उत्पन्न होने की इच्छा ; — उद्बुभूषुता — उद्भव की निकट-इच्छा ; — उद्भविष्यत्व — उद्भव-उन्मुखता ; — उद्भव-आरम्भ — उद्भव का प्रारम्भ ; — उद्भवत्ता — उद्भव (जन्म) की दशा ; — जन्म आदि छह विकार ; — मकर आदि राशियों में

उसमें प्रत्येक अँगुल में पाँच तिथियाँ; वहाँ भी दिन-रात का विभाग (होता है)। इस प्रकार प्रवेश में दक्षिणायन है; और गर्भत्व, उद्भव-इच्छा, उद्बुभूषुता, उद्भविष्यत्व, उद्भव-आरम्भ, उद्भवत्ता — जन्म आदि छह विकार — मकर आदि (राशियों) में क्रमशः (होते हैं)।