The Essence of the Tantra· 13.21 / 101

The Essence of the Tantra13.21

13.21

इत्य् एवं संविन्महिमैव मूर्तिकृतं दिग्भेदं भासयति इति दिक् न तत्त्वान्तरम्

Transliteration (IAST)

ity evaṃ saṃvinmahimaiva mūrtikṛtaṃ digbhedaṃ bhāsayati iti dik na tattvāntaram

— संवित् की महिमा ही ; — मूर्ति-कृत दिक्-भेद (रूप से उत्पन्न दिशा-भेद) ; — भासित करती है ; — दिक् — दिशा (स्थान) ; — पृथक् तत्त्व नहीं

इस प्रकार संवित् की महिमा ही मूर्ति-कृत दिक्-भेद को भासित करती है — अतः दिक् (दिशा) कोई पृथक् तत्त्व नहीं है।