The Vision of Śiva· 7.91 / 122

The Vision of Śiva7.91

7.91
सोऽहं शिवः सुतृप्तोऽस्मि होम इत्युदितः परः । अत्राकारे न यन्मेऽस्ति तदाकारान्तरेऽस्ति मे ॥९१॥
so'haṃ śivaḥ sutṛpto'smi homa ityuditaḥ paraḥ | atrākāre na yanme'sti tadākārāntare'sti me
— 'मैं वह शिव' ; — 'सुतृप्त हूँ' ; — होम (आहुति) ; — इस प्रकार कहा गया ; — परम ; — इस आकार में ; — जो मेरी नहीं ; — वह ; — अन्य आकार में ; — मेरी है

'मैं वही शिव हूँ, सुतृप्त (पूर्णतः तृप्त) हूँ' — इस प्रकार परम होम (आहुति) कहा गया है; और जो (वस्तु) इस आकार में मेरी नहीं है, वह अन्य आकार में मेरी है (— अतः कुछ भी एक आत्मा के बाहर नहीं रहता)।