प्रसर्पत्यपरेच्छैव पुनरन्या तथाविधा ॥८९॥
prasarpatyaparecchaiva punaranyā tathāvidhā
दूसरी इच्छा ही प्रसर्पित (प्रवाहित) होती है, फिर वैसी ही अन्य (इच्छा — अतः कोई जड़ अन्तराल नहीं)।
दूसरी इच्छा ही प्रसर्पित (प्रवाहित) होती है, फिर वैसी ही अन्य (इच्छा — अतः कोई जड़ अन्तराल नहीं)।