The Vision of Śiva· 3.89 / 99

The Vision of Śiva3.89

3.89
प्रसर्पत्यपरेच्छैव पुनरन्या तथाविधा ॥८९॥
prasarpatyaparecchaiva punaranyā tathāvidhā
— प्रसर्पित होती है ; — दूसरी इच्छा ही ; — फिर ; — अन्य ; — वैसी ही

दूसरी इच्छा ही प्रसर्पित (प्रवाहित) होती है, फिर वैसी ही अन्य (इच्छा — अतः कोई जड़ अन्तराल नहीं)।