यत्रात्मानुभवानिष्ठा तत्रेच्छा च न किं भवेत् ॥९०॥
yatrātmānubhavāniṣṭhā tatrecchā ca na kiṃ bhavet
और जहाँ (वह) अपने आत्मा के अनुभव में निष्ठ है, वहाँ भी क्या इच्छा नहीं होगी (होगी ही)?
और जहाँ (वह) अपने आत्मा के अनुभव में निष्ठ है, वहाँ भी क्या इच्छा नहीं होगी (होगी ही)?