The Vision of Śiva· 2.7 / 90

The Vision of Śiva2.7

2.7
संप्राप्ता वक्त्रकुहरं कण्ठादिस्थानभागशः । वैखरी कथ्यते सैव बहिर्वासनया क्रमात् ॥७॥
saṃprāptā vaktrakuharaṃ kaṇṭhādisthānabhāgaśaḥ | vaikharī kathyate saiva bahirvāsanayā kramāt
— पहुँचकर ; — मुख के विवर में ; — कण्ठ आदि स्थानों के भागों के अनुसार ; — वैखरी ; — कही जाती है ; — वही (शब्द) ; — बाह्य वासना से ; — क्रमशः

मुख के विवर में पहुँचकर, कण्ठ आदि स्थानों के अनुसार भागों में (विभक्त होकर), बाह्य वासना से क्रमशः वही 'वैखरी' कही जाती है।