संप्राप्ता वक्त्रकुहरं कण्ठादिस्थानभागशः ।
वैखरी कथ्यते सैव बहिर्वासनया क्रमात् ॥७॥
saṃprāptā vaktrakuharaṃ kaṇṭhādisthānabhāgaśaḥ |
vaikharī kathyate saiva bahirvāsanayā kramāt
मुख के विवर में पहुँचकर, कण्ठ आदि स्थानों के अनुसार भागों में (विभक्त होकर), बाह्य वासना से क्रमशः वही 'वैखरी' कही जाती है।