Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.71 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.71

18.71
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभांल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ १८-७१ ॥
śraddhāvānanasūyaśca śṛṇuyādapi yo naraḥ | so'pi muktaḥ śubhāṃllokānprāpnuyātpuṇyakarmaṇām || 18-71 ||
— श्रद्धावान् और दोषदृष्टि से रहित ; — जो मनुष्य इसे केवल सुन भी ले ; — वह भी मुक्त होकर शुभ लोकों को ; — प्राप्त करेगा, पुण्यकर्मियों के

और जो मनुष्य श्रद्धावान् और दोषदृष्टि से रहित होकर इसे केवल सुन भी लेगा — वह भी मुक्त होकर पुण्यकर्म करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त करेगा।