Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.57 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.57

18.57
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य भारत । बुद्धियोगं समाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ १८-५७ ॥
cetasā sarvakarmāṇi mayi saṃnyasya bhārata | buddhiyogaṃ samāśritya maccittaḥ satataṃ bhava || 18-57 ||
— मन से समस्त कर्मों को ; — मुझमें संन्यस्त करके, हे भारत ; — बुद्धियोग का आश्रय लेकर ; — निरन्तर मुझमें चित्त वाला हो

हे भारत, मन से समस्त कर्मों को मुझमें संन्यस्त करके, बुद्धियोग का आश्रय लेकर, निरन्तर मुझमें चित्त वाला हो।