Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.52 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.52

18.52
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ १८-५२ ॥
viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ | dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ || 18-52 ||
— एकान्तसेवी, मिताहारी ; — वाणी, शरीर, मन को संयत किए ; — नित्य ध्यानयोग में तत्पर ; — वैराग्य का आश्रय लेकर

एकान्तसेवी, मिताहारी, वाणी, शरीर और मन को संयत किए हुए, नित्य ध्यानयोग में तत्पर, और वैराग्य का आश्रय लेकर,