Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.47 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.47

18.47
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ॥ १८-४७ ॥
śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt | svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilviṣam || 18-47 ||
— गुणरहित (अपूर्ण) अपना धर्म श्रेष्ठ ; — भली-भाँति आचरित परधर्म से ; — स्वभाव से नियत कर्म ; — करता हुआ पाप को प्राप्त नहीं होता

गुणरहित (अपूर्ण) अपना धर्म भली-भाँति आचरित पराये धर्म से श्रेष्ठ है; अपने स्वभाव से नियत कर्म करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।