Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.26 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.26

18.26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ १८-२६ ॥
muktasaṅgo'nahaṃvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ | siddhyasiddhyornirvikāraḥ kartā sāttvika ucyate || 18-26 ||
— आसक्ति से मुक्त, अहंकार न बोलने वाला ; — धृति और उत्साह से युक्त ; — सिद्धि-असिद्धि में निर्विकार ; — कर्ता सात्त्विक कहलाता है

आसक्ति से मुक्त, अहंकार न बोलने वाला, धृति और उत्साह से युक्त, सिद्धि-असिद्धि में निर्विकार कर्ता सात्त्विक कहलाता है।