Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.25 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.25

18.25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ १८-२५ ॥
anubandhaṃ kṣayaṃ hiṃsāmanavekṣya ca pauruṣam | mohādārabhyate karma yattattāmasamucyate || 18-25 ||
— अनुबन्ध (परिणाम), क्षय, हिंसा ; — और अपने सामर्थ्य का विचार किए बिना ; — मोह से जो कर्म आरम्भ किया जाता है ; — वह तामस कहलाता है

जो कर्म मोह से, अनुबन्ध (परिणाम), क्षय, हिंसा और अपने सामर्थ्य का विचार किए बिना आरम्भ किया जाता है — वह तामस कहलाता है।