Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.17 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.17

18.17
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाꣳल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १८-१७ ॥
yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate | hatvāpi sa imāṁllokānna hanti na nibadhyate || 18-17 ||
— जिसका भाव अहंकार से रहित ; — जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती ; — इन समस्त लोकों को मारकर भी, वह ; — न मारता है, न बँधता है

जिसका भाव अहंकार से रहित है, जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन समस्त लोकों को मारकर भी न मारता है, न बँधता है।