Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.15 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.15

18.15
शरीरवाङ्मनोभिर्हि यत्कर्मारभतेऽर्जुन । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १८-१५ ॥
śarīravāṅmanobhirhi yatkarmārabhate'rjuna | nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ || 18-15 ||
— शरीर, वाणी, मन से ; — जो कर्म मनुष्य आरम्भ करता है, हे अर्जुन ; — न्याय्य हो अथवा विपरीत ; — ये पाँच ही उसके कारण

हे अर्जुन, मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, चाहे न्याय्य हो या विपरीत, उसके ये पाँच ही कारण हैं।