Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.18 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.18

10.18
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १०-१८ ॥
vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana | bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me'mṛtam || 10-18 ||
— विस्तार से अपने योग को ; — और विभूति को, हे जनार्दन ; — फिर कहिए, क्योंकि तृप्ति ; — सुनते हुए मुझे आपके अमृत-वचन से नहीं होती

हे जनार्दन, अपने योग और विभूति को फिर से विस्तार से कहिए; क्योंकि आपके अमृत-वचन को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।