स्वयमप्यन्धतामिस्रे पतन्त्याहूतसंप्लवम् ।
ब्रह्मसात्कृतनैवेद्यद्वेष्टॄणां नास्ति निष्कृतिः ॥९५॥
svayamapyandhatāmisre patantyāhūtasaṃplavam |
brahmasātkṛtanaivedyadveṣṭṝṇāṃ nāsti niṣkṛtiḥ ||95||
और वे स्वयं भी अपने द्वारा आहूत प्रलय (रूपी) अन्धतामिस्र (नरक) में गिरते हैं। ब्रह्म को समर्पित नैवेद्य से द्वेष करने वालों के लिए कोई निष्कृति नहीं है।