The Great Liberation Tantra· 3.95 / 153

The Great Liberation Tantra3.95

3.95
स्वयमप्यन्धतामिस्रे पतन्त्याहूतसंप्लवम् । ब्रह्मसात्कृतनैवेद्यद्वेष्टॄणां नास्ति निष्कृतिः ॥९५॥
svayamapyandhatāmisre patantyāhūtasaṃplavam | brahmasātkṛtanaivedyadveṣṭṝṇāṃ nāsti niṣkṛtiḥ ||95||
— स्वयं भी ; — अन्धतामिस्र (नरक) में ; — गिरते हैं ; — आहूत प्रलय में ; — ब्रह्म को समर्पित नैवेद्य से द्वेष करने वालों के लिए ; — नहीं है ; — निष्कृति

और वे स्वयं भी अपने द्वारा आहूत प्रलय (रूपी) अन्धतामिस्र (नरक) में गिरते हैं। ब्रह्म को समर्पित नैवेद्य से द्वेष करने वालों के लिए कोई निष्कृति नहीं है।