The Great Liberation Tantra· 3.147 / 153

The Great Liberation Tantra3.147

3.147
स्वमन्त्रदाने यो दोषस्तथा पित्रादिदीक्षया । सिद्धे ब्रह्ममहामन्त्रे तद्दोषो नैव विद्यते ॥१४७॥
svamantradāne yo doṣastathā pitrādidīkṣayā | siddhe brahmamahāmantre taddoṣo naiva vidyate ||147||
— अपना मन्त्र देने में ; — जो ; — दोष ; — और इसी प्रकार ; — पिता आदि की दीक्षा से ; — सिद्ध होने पर ; — ब्रह्म-महामन्त्र के ; — वह दोष ; — नहीं ही ; — होता

अपना मन्त्र देने में जो दोष है, और इसी प्रकार पिता आदि की दीक्षा में (जो दोष है) — सिद्ध ब्रह्म-महामन्त्र के विषय में वह दोष होता ही नहीं।