ब्रह्मज्ञानिमुखात् श्रुत्वा येन केन विधानतः ।
ब्रह्मभूतो नरः पूतः पुण्यपापैर्न लिप्यते ॥१४८॥
brahmajñānimukhāt śrutvā yena kena vidhānataḥ |
brahmabhūto naraḥ pūtaḥ puṇyapāpairna lipyate ||148||
ब्रह्मज्ञानी के मुख से सुनकर, चाहे जिस किसी विधान से, ब्रह्मभूत मनुष्य पूत (पवित्र) हो जाता है, और पुण्य-पाप से लिप्त नहीं होता।