The Great Liberation Tantra· 3.148 / 153

The Great Liberation Tantra3.148

3.148
ब्रह्मज्ञानिमुखात् श्रुत्वा येन केन विधानतः । ब्रह्मभूतो नरः पूतः पुण्यपापैर्न लिप्यते ॥१४८॥
brahmajñānimukhāt śrutvā yena kena vidhānataḥ | brahmabhūto naraḥ pūtaḥ puṇyapāpairna lipyate ||148||
— ब्रह्मज्ञानी के मुख से ; — सुनकर ; — जिस किसी ; — विधान से ; — ब्रह्मभूत ; — मनुष्य ; — पूत, पवित्र ; — पुण्य-पाप से ; — नहीं ; — लिप्त होता

ब्रह्मज्ञानी के मुख से सुनकर, चाहे जिस किसी विधान से, ब्रह्मभूत मनुष्य पूत (पवित्र) हो जाता है, और पुण्य-पाप से लिप्त नहीं होता।