The Great Liberation Tantra· 3.149 / 153

The Great Liberation Tantra3.149

3.149
ब्रह्ममन्त्रोपासिता ये गृहस्था ब्राह्मणादयः । स्वस्ववर्णोत्तमारते तु पूज्या मान्या विशेषतः ॥१४९॥
brahmamantropāsitā ye gṛhasthā brāhmaṇādayaḥ | svasvavarṇottamārate tu pūjyā mānyā viśeṣataḥ ||149||
— ब्रह्म-मन्त्र के उपासक ; — जो ; — गृहस्थ ; — ब्राह्मण आदि ; — अपने-अपने वर्ण में उत्तम और (इसमें) रत ; — निश्चय ही ; — पूज्य ; — मान्य ; — विशेष रूप से

जो गृहस्थ ब्राह्मण आदि ब्रह्म-मन्त्र की उपासना करते हैं — अपने-अपने वर्ण में उत्तम और (इसमें) रत — वे विशेष रूप से पूज्य और मान्य हैं।