The Great Liberation Tantra· 3.144 / 153

The Great Liberation Tantra3.144

3.144
देवर्षिवक्त्रान्मुनयस्तेभ्यो राजर्षयः प्रिये । उपासिता ब्रह्मभूताः परमात्मप्रसादतः ॥१४४॥
devarṣivaktrānmunayastebhyo rājarṣayaḥ priye | upāsitā brahmabhūtāḥ paramātmaprasādataḥ ||144||
— देवर्षियों के मुख से ; — मुनियों ने ; — उनसे ; — राजर्षियों ने ; — हे प्रिये ; — उपासना करके ; — ब्रह्मभूत हो गए ; — परमात्मा के प्रसाद से

हे प्रिये, देवर्षियों के मुख से मुनियों ने, और उनसे राजर्षियों ने (इसे सीखा); उपासना करके वे परमात्मा के प्रसाद से ब्रह्मभूत हो गए।