The Great Liberation Tantra3.145
ब्राह्मे मनौ महेशानि विचारो नास्ति कुत्रचित् ।
स्वीयमन्त्रं गुरुर्दद्यात् शिष्येभ्यो ह्यविचारयन् ॥१४५॥
brāhme manau maheśāni vicāro nāsti kutracit |
svīyamantraṃ gururdadyāt śiṣyebhyo hyavicārayan ||145||
— ब्रह्म- ; — मन्त्र में ; — हे महेशानि ; — विचार ; — नहीं है ; — कहीं भी ; — अपने मन्त्र को ; — गुरु दे ; — शिष्यों को ; — निश्चय ही बिना विचार किए हे महेशानि, ब्रह्म-मन्त्र में कहीं भी कोई विचार नहीं; गुरु अपने मन्त्र को बिना किसी विचार के शिष्यों को दे।