The Great Liberation Tantra· 3.112 / 153

The Great Liberation Tantra3.112

3.112
ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय प्रणम्य ब्रह्मदं गुरुम् । ध्यात्वा च परमं ब्रह्म यथाशक्ति मनुं स्मरेत् । पूर्ववत् प्रणमेद् ब्रह्म प्रातःकृत्यमिदं स्मृतम् ॥११२॥
brāhme muhūrte cotthāya praṇamya brahmadaṃ gurum | dhyātvā ca paramaṃ brahma yathāśakti manuṃ smaret | pūrvavat praṇamed brahma prātaḥkṛtyamidaṃ smṛtam ||112||
— ब्राह्म (मुहूर्त) में ; — मुहूर्त में ; — और उठकर ; — प्रणाम करके ; — ब्रह्म-दाता को ; — गुरु को ; — ध्यान करके ; — और ; — परम ; — ब्रह्म ; — यथाशक्ति ; — मन्त्र को ; — स्मरण करे ; — पूर्ववत् ; — ब्रह्म को प्रणाम करे ; — यह प्रातः-कृत्य ; — कहा गया है

ब्राह्म मुहूर्त में उठकर, ब्रह्म-दाता गुरु को प्रणाम करके, और परम ब्रह्म का ध्यान करके, यथाशक्ति मन्त्र का स्मरण करे; फिर पूर्ववत् ब्रह्म को प्रणाम करे — यह प्रातः-कृत्य कहा गया है।