The Great Liberation Tantra· 2.44 / 54

The Great Liberation Tantra2.44

2.44
यद्भयाद्वाति वातोऽपि सूर्यस्तपति यद्भयात् । वर्षन्ति तोयदाः काले पुष्पन्ति तरवो वने ॥४४॥
yadbhayādvāti vāto'pi sūryastapati yadbhayāt | varṣanti toyadāḥ kāle puṣpanti taravo vane ||44||
— जिसके भय से ; — बहती है ; — वायु ; — भी ; — सूर्य ; — तपता है ; — जिसके भय से ; — वर्षा करते हैं ; — मेघ ; — समय पर ; — पुष्पित होते हैं ; — वृक्ष ; — वन में

जिसके भय से वायु बहती है, जिसके भय से सूर्य तपता है, जिसके भय से मेघ समय पर वर्षा करते हैं और वन में वृक्ष पुष्पित होते हैं —